मोहन सिंह : देवरिया

देवरिया के बरहज कस्बे से सटे जयनगर गांव से निकले मोहन सिंह ने देश के सर्वश्रेष्ठ सांसद तक का सफर तय किया। छात्र राजनीति से शुरू हुआ उनका सफर देश के चारों सदनों का सदस्य बनने तक चला। राजनीति के साथ लेखन के क्षेत्र में अमिट छाप छोड़ने वाले मोहन ने अपने लिए तय किए मानकों से कभी समझौता नहीं किया। पूरे राजनीतिक जीवन में कभी अंगरक्षक नहीं लिया। देशस्तर पर पहचान बनाने वाले मोहन में संवेदनशीलता कूट- कूट कर भरी थी। यही वजह थी कि नरायनपुर कांड को लेकर मंत्री रहते हुए भी उन्होंने अपनी सरकार के खिलाफ खुलकर बोला और प्रदेश की सरकार उनके इस बयान के चलते चली गई।जयनगर गांव में महेन्द्र प्रताप सिंह के घर 4 मार्च 1945 को मोहन सिंह का जन्म हुआ। उनके पिता महेन्द्र प्रताप स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। गांव के ही स्कूल में प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद उन्होंने बरहज से 1959 में हाईस्कूल व 1961 में इंटर की शिक्षा पूरी की। पढ़ने में तेज व कुशाग्र बुद्धि के धनी मोहन को घर वालों ने स्नातक की शिक्षा के लिए इलाहाबाद भेज दिया। 1962 में बीए प्रथम वर्ष का छात्र रहने के दौरान ही उन्होंने विश्वविद्यालय के सामने डा राममनोहर लोहिया का भाषण सुना। इस भाषण का उनपर गहरा प्रभाव हुआ और उन्होंने डा लोहिया के साथ काम करने का मन बना लिया। 1965 में एमए अच्छे नंबरों से पास किया। ब्राह्मण ग्रंथों में जनजीवन विषय पर शोध शुरू किया। इसी बीच 1968 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ का चुनाव हुआ, जिसमें मोहन अध्यक्ष के प्रत्याशी बने। भाषण कला में निपुण मोहन महज 23 वर्ष की उम्र में पहले प्रयास में ही अध्यक्ष चुने गए। अध्यक्ष बनने के साथ ही शोध पीछे छूट गया और वे मधु लिमये के साथ पूर्णकालिक तौर पर जुड़ गए। राजनीति के साथ लेखन और अध्ययन से बना रहा जुड़ावराजनीति में आने के बाद भी मोहन सिंह का लेखन व अध्ययन से हमेशा जुड़ाव बना रहा। 1970 में नई संविधान सभा आवश्यक क्यों पर शोध लिखा, जिस पर उन्हें पांच हजार का पुरस्कार मिला। 1971 में युवाओं की समस्याओं पर अध्ययन के लिए डा कोठारी की अध्यक्षता में एक समिति बनी। पूरे देश से इस समिति में तीन छात्रनेताओं को रखा गया। उसमें एक मोहन सिंह भी थे। अपनी क्षमता के चलते मोहन सिंह का रोज विस्तार होता गया। उसीसाल हैदराबाद में हुई सोशलिस्ट पार्टी की यूथ कांफ्रेंस में उन्हें राष्ट्रीय मंत्री चुना गया। उन्हें पार्टी की तरफ से बेल्जियम में हुई सोशलिस्ट कांफ्रेंस में भेजा गया। इसके बाद सोशलिस्ट आंदोलन कैसा विषय पर अध्ययन के लिए डेढ़ माह का यूरोप के विभिन्न देशों का कार्यक्रम बना। उन्होंने टीम के साथ जर्मनी, हालैण्ड, बेल्जियम, फ्रांस, इग्लैण्ड का दौरा किया। मोहन ने लिखी दर्जनों किताबेंमोहन सिंह ने राजनीति में रहने के बाद अध्ययन से गहरा रिश्ता बनाए रखा। उन्होंने यादें और बातें, भारतीय संविधान का निर्माण और नेहरू की भूमिका, समाजवादी आंदोलन का संक्षिप्त इतिहास, डा अंबेडकर: व्यक्तित्व के कुछ पहलू, उग्रसेन स्मृति ग्रंथ आदि पुस्तके लिखी। इसके अलावा उन्होंने कई यात्रा संस्मरण भी लिखे। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में उनके लेख नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे। आपातकाल में बीस माह रहे जेल में बंद1974 में पार्टी के बंटने के बाद मोहन सिंह को उत्तर प्रदेश में काम करने के लिए भेज दिया गया। उन्हें प्रदेश समाजवादी पार्टी का संयुक्त सचिव बनाया गया। उसी समय जेपी आंदोलन की शुरूआत हुई, जिसमें उन्होंने बढ़चढ़ कर भाग लिया। मोहन सिंह गिरफ्तार हुए और उन्हें जेल भेज दिया गया। बीस माह तक वे जेल में बंद रहे। 1977 में जनता पार्टी से वे पहली बार बरहज से चुनाव लड़े और विधायक बने। इस बीच वे जनता पार्टी के जनरल सेक्रेटरी बने। 1978 में जनता पार्टी की सरकार में लघु उद्योग राज्य मंत्री बने। 1980 में फिर विधायक बने, लेकिन 1985 और 1989 का चुनाव हार गए। इस बीच 1990 में हुए देवरिया- कुशीनगर स्थानीय प्राधिकारी निर्वाचन क्षेत्र से विधान परिषद सदस्य चुने गए और उनका प्रवेश विधान परिषद में हुआ। जनता दल के गठन के बाद मोहन सिंह 1991 में पार्टी से लोकसभा का चुनाव लड़े और संसद सदस्य बने। पहली बार लोकसभा में पहुंचे मोहन को पार्टी के संसदीय दल का मुख्य सचेतक बनाया गया। 1996 में समाजवादी पार्टी में आए, पर टिकट न मिलने के कारण चुनाव नहीं लड़े। 1998 में फिर सांसद बने, पर 1999 का चुनाव हार गए। 2004 में समाजवादी पार्टी से फिर सांसद बने। इस बीच 2008 में उन्हें सर्वश्रेष्ठ सांसद चुना गया। 2009 का चुनाव वे फिर हार गए। 2010 में पार्टी ने उन्हें राज्य सभा में भेज दिया। वे पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव के साथ प्रवक्ता भी रहे। मोहन सिंह राज्यसभा का अपना कार्यकाल पूरा नहीं सके और 22 सितम्बर 2013 को उनका निधन हो गया। अपनी ही सरकार में स्वीकारी पीएसी की ज्यादती, सरकार हुई बर्खास्तमोहन सिंह 1977 में प्रदेश में बनी जनता पार्टी की सरकार बनी। इस सरकार में वे लघु उद्योग राज्य मंत्री थे। इसी बीच जून 1980 में जिले के नरायनपुर (अब कुशीनगर जिला) कांड हुआ। गृह जनपद होने के कारण मोहन सिंह अपने दल- बल के साथ वहां पहुंचे। गांव के लोगों ने उन्हें पुलिस व पीएसी ज्यादती की बात बताई। वहां से लौटने के बाद मोहन सिंह ने मीडिया से बात की, जिसमें उन्होंने स्वीकार किया कि नरायनपुर में पीएसी ने ज्यादती की है। उन्होंने इसको लेकर कड़ी टिप्पणी की। मोहन सिंह की इस स्वीकरोक्ति के चलते प्रदेश की बनारसी दास की सरकार बर्खास्त कर दी गई। मोहन की यादों में सहेजने में जुटी हैं उनकी पुत्रीमोहन सिंह के निधन के बाद उनकी पुत्री कनकलता सिंह को समाजवादी पार्टी ने राज्यसभा में भेजा था। श्रीमती सिंह कहती है कि पिता की यादों को सिर्फ सहेजने का ही नहीं, उनके व्यक्तित्व व विचारों के अनुसार कार्य करने का प्रयास भी कर रही हूं। मेरे पिता ने पूरे जीवन भर लोगों की मदद की तथा प्रयास किया कि उनके कार्य से किसी को ठेस न पहुंचे। पूरी तरह उनके जैसा बन पाना काफी कठिन है, लेकिन अपने स्तर से मै पूरा प्रयास करती हूं कि इस तरह कार्य करती रहूं कि लोग उनकी बेटी के तौर पर मुझे भी सराहें।  मोहन सेतु व बाबू मोहन सिंह जिला अस्पताल है उनके नाम परमोहन सिंह के निधन के बाद उनकी पुत्री के प्रयास से मुख्यालय पर स्थापित जिला अस्पताल का नामकरण उनके नाम पर कर दिया गया। अब उस अस्पताल को बाबू मोहन सिंह जिला अस्पताल के नाम से जाना जाता है। इसी तरह बरहज में सरयू नदी पर दो सौ करोड़ की लागत से एक पुल भी मोहन सिंह सेतु नाम से बन रहा है। जिला मुख्यालय पर सपा सरकार के समय मोहन सिंह के नाम पर साढ़े चार करोड़ की लागत से एक सभागार स्वीकृत किया। इस सभागार का निर्माण कार्य अभी चल रहा है। उनकी पुत्री कनकलता सिंह कहती हैं कि मेरा प्रयास है कि उनकी निधि से दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय में बने संग्रहालय का नाम बाबू मोहन सिंह पूर्वांचल संग्रहालय हो जाय। मोहन ने जिले को दी देश स्तर पर पहचानमोहन सिंह आज की पीढ़ी के लिए भी प्रेरणा के बिन्दु हैं। उनके गांव ही नहीं जिले के युवा मानते हैं कि उन्होंने देवरिया का नाम देश स्तर पर रोशन किया। उनकी लेखनी, भाषण कला से कई जगहों पर लोग उनके नाम से जिले को जानने लगे थे। इन युवाओं का कहना है कि आज की राजनीति में मोहन सिंह जैसे लोगों की काफी जरूरत है। उनके गांव के गोवर्धन सोनकर, देवीशरण सोनकर, सचिन सिंह, नीरज मद्धेशिया केदार विश्वकर्मा जैसे लोग उनका नाम आते ही उनसे जुड़ी बातों की चर्चा करने लगते हैं।